नौकरी और विवाह के बाद क्या ….

अधिकांश लोगों में देखा गया है की वह जीवन के मध्य में आते आते नीरस हो जाते हैं । शिशु जब मां की गोद से ज़मीन पर पांव रखता है तो उसको किताबो भरा बैग कांधे पर लादना सिखा दिया जाता है । मां बाप अपने बच्चो के भविष्य में ऐसे लिप्त हो जाते हैं जैसे की वही उनका संसार है , व शायद एक मात्र जीवन लक्ष्य भी । बच्चा भी शायद केवल उसी धुरी के आस पास घूमता रहता है । सुबह आंख खुलते स्कूल ड्रेस , दिन में स्कूल , शाम को ट्यूशन व रात को रिविज़न करना ही उसकी दिनचर्या बन जाती है । खेल कूद , सामाजिक मेल जोल में यदि वह रुचि दिखाए तो उसको यह कह कर दूर कर दिया जाता है कि इससे भविष्य खराब होगा । जैसे जैसे साल गुजरते हैं उस पर अपने करियर का बोझ और भारी होता जाता है । करियर के आगे और कुछ भी जरूरी नहीं होता । हो भी क्यो न आखिर उसी पैमाने पर तो उसको आगे तौला जायेगा ।अच्छी नौकरी होगी तो पैसे शौहरत सब होगा , ज़िंदगी आराम से कटेगी , फिर क्या हुआ जो आपके भीतर का इंसान मर ही क्यों न गया हो । अब नौकरी मिल गई , जीवन का लक्ष्य कुछ तो पूरा हुआ , अब एक और नई चुनौती वो है विवाह ।

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अब एक बाज़ार सा लग जाता है , जैसी नौकरी वैसा रिश्ता आएगा । नाप तौल होगी , ऊंच नीच देखी जायेगी , फिर दिल मिले या न मिलें , शादी का मेल हो ही जायेगा । न हुआ तो समाज किसी भी किनारे खड़ा नही होने देगा । अरे अब नौकरी का करोगे ही क्या जब परिवार ही नही होगा , दूसरे का नहीं खुद का परिवार । बीवी बच्चे …। बस ये दो काम हो गए गंगा नहा लिए । लेकिन ये क्या अब जब नौकरी भी मिल गई , बीवी बच्चे भी हो ही गए , फिर सुख भोगने के दिनों में ये नीरसता क्यों भर गई जीवन में । सुबह वही उठना , बच्चो की चे चे , दफ्तर जाने की जल्दी , दिन भर वही काम , फिर शाम को घर आना , चाय पीना , डिनर और रात में सुबह का खयाल लिए आधी नींद सो जाना । असल में यही सोच और जीवन शैली एक गंभीर समस्या बन गई है । मनुष्य मशीन बन गया है । नयापन खत्म होता जा रहा है । जो होता आया है बस वही सत्य है उसके आगे दिमाग जाना ही नही चाहता । सब कुछ होते हुए भी खुशी नहीं , सुकून नहीं । क्या यही पाना था ? यही वो लक्ष्य था जिसके लिए दिन रात एक किए थे ? सारी मोह माया , इक्षाये , शौक़ मार दिए थे ?

Image courtesy: The New Indian express

अधूरापन

  • भीड़ में अकेला महसूस होता है
  • जो गीत बहुत पसंद था उसको गुनगुनाने का समय नहीं मिलता
  • खुद के शरीर की साज सज्जा में मन नहीं लगता
  • सुकून न पहाड़ो पर मिलता है न शीतल नदी की लहरों को देख कर मन खुश होता है
  • हमसफर पास तो है लेकिन साथ का एहसास नहीं होता
  • छोटी छोटी खुशियां हैं ही नहीं ,
  • पसंद नापसंद से फर्क नही पड़ता
  • ऊंचा मकान भी बन गया फिर भी आसमान क्यों पास नही दिखता

समाधान

क्या होना चाहिए , कैसा होना चाहिए । नौकरी और शादी के बाद भी वो सब जिंदा रखना जरूरी है जो अंदर बैठा नीरसता की आग में झुलस रहा है । अपना खुद का व्यक्तित्व । हमेशा कुछ नया करने की चाह होनी चाहिए । कोई नया गीत , कोई नया लेख , कोई नई कविता , कोई नई ड्रेस , कोई नया दोस्त , कोई नई रुचि । जीवन कहीं भी रुकना नही चाहिए , लक्ष किसी भी एक वस्तु में नहीं पाया जा सकता । जीवन में संतोष ढूढने के लिए खुद को ढूंढना जरूरी है , अपने अंदर का इंसान मरना ही मृत्यु है । इतने सारे काम है करने को , अपना घर बस गया तो दूसरे की कुटिया का दिया जलाएं । असल में सुकून किसी कुर्सी पर बैठने में नहीं , असल सुकून उस कुर्सी पर बैठ कर उसके दायित्वों को अंजाम देने में है , असल सुकून विवाह और बच्चो में नहीं , असल सुकून हमसफर की मुस्कुराहट और बच्चो के सफल पालन पोषण में है । एक साफ कोमल मन ही सफल है जिसमे मैल अभी नहीं आया । आपका खुद का हृदय ही आपको संतुष्ट रखने में सहायक होगा ।

खुशी के मायने हर व्यक्ति के लिए अलग अलग होते है , आप जानिए की आपके लिए खुशी किसमे है , इसी सवाल का जवाब आपके हर सवाल का जवाब होगा ।

Image courtesy : Thought for today

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Writing about my own experiences and thoughts and also to evaluate them from time to time . A civil servant , a learner .

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Sarika Singh

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